शब्दों की शक्ति: व्यक्तिगत प्रेरणा से लेकर दबे हुए इतिहास की आवाज बनने तक

साहित्य और कविता केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और समाज के अनकहे सच को सामने लाने का एक सशक्त माध्यम है। चाहे वह भारत की सरज़मीं पर लिखी गई उर्दू शायरी हो या आयरलैंड की वादियों में रची गई अंग्रेजी कविताएँ, दोनों का मूल उद्देश्य एक ही है—मनुष्य को भीतर से झकझोरना और उसे नई दिशा देना। अक्सर कहा जाता है कि दिन की शुरुआत अगर किसी सकारात्मक विचार या शेर से हो, तो पूरा दिन ऊर्जा से भरा रहता है। भारतीय साहित्य में ऐसे कई अनमोल रत्न हैं जो निराशा के बादलों को छांटने का माद्दा रखते हैं।

हौसले और तकदीर की नई परिभाषा

उर्दू और हिंदी शायरी की रिवायत हमें सिखाती है कि इंसान अपनी किस्मत का खुद निर्माता है। अनवर शऊर का यह कहना कि “इत्तिफ़ाक़ अपनी जगह ख़ुश-क़िस्मती अपनी जगह, ख़ुद बनाता है जहाँ में आदमी अपनी जगह,” इस बात का प्रमाण है कि सफलता संयोग नहीं, बल्कि संघर्ष का परिणाम है। इसी तरह, जीवन में आने वाली मुश्किलों को देखने का नज़रिया भी मायने रखता है। अख़्तर शीरानी हमें याद दिलाते हैं कि गम की घटाओं से ही खुशी का चाँद निकलता है, यानी संघर्ष के गर्भ में ही सफलता छिपी होती है।

निराशा के क्षणों में निदा फ़ाज़ली का यह संदेश कि केवल उम्मीद रखने से काम नहीं चलता, बल्कि रास्ता चुनने और मुकद्दर तलाशने की जरूरत है, युवाओं के लिए एक मंत्र की तरह है। अल्लामा इक़बाल तो इससे भी एक कदम आगे जाकर ‘खुदी’ यानी आत्म-सम्मान को इतना बुलंद करने की बात कहते हैं कि भगवान भी बंदे से उसकी रज़ा पूछने पर मजबूर हो जाए। यह दर्शन केवल शायरी नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। हफ़ीज़ बनारसी और वसीम बरेलवी जैसे शायर कर्मठता पर जोर देते हैं। उनका मानना है कि थक कर बैठ जाने वाले को मंजिल नहीं मिलती और जो खुद जलता है, वही रोशनी लुटाता है। राहत इंदौरी का यह तंज कि “हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा,” आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा उदाहरण है।

कविता: प्रतिरोध और इतिहास का दस्तावेज

जहां एक ओर भारतीय शायरी व्यक्तिगत संघर्ष और हौसले को बुलंद करती है, वहीं दूसरी ओर सात समंदर पार आयरलैंड में कविता का एक अलग ही रूप सामने आ रहा है। यह रूप व्यक्तिगत प्रेरणा से आगे बढ़कर इतिहास की उन गलतियों को सुधारने का प्रयास है, जिन्हें जानबूझकर दफन कर दिया गया था। आयरिश कवयित्री ऐनेमैरी नी कुरान का तीसरा काव्य संग्रह, हाइम टू ऑल द रेस्टलेस गर्ल्स, इसी प्रतिरोध की आवाज है।

ऐनेमैरी अपनी कविताओं में ‘रेवेन’ (एक प्रकार का कौआ) को एक केंद्रीय प्रतीक मानती हैं। पक्षी विज्ञान बताता है कि पक्षियों के गीत पीढ़ियों तक हस्तांतरित होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे इंसानी भाषा। जब एक रेवेन गाता है, तो वह केवल ध्वनि नहीं करता, बल्कि वह उस परिदृश्य और संस्कृति का एक पुरालेख (आर्काइव) होता है। ऐनेमैरी के अनुसार, ये पक्षी अतीत के संदेशवाहक हैं। उनकी कविताओं में रेवेन उन ‘बेचैन लड़कियों’ के लिए मार्गदर्शक हैं, जिनका इतिहास आयरिश फ्री स्टेट और चर्च द्वारा दबा दिया गया था।

दबी हुई आवाजों का पुनरुत्थान

ऐनेमैरी का संग्रह उन महिलाओं की कहानियों को फिर से जीवित करता है जिन्हें ‘मदर एंड बेबी होम्स’ जैसी संस्थाओं में प्रताड़ित किया गया। आधिकारिक अभिलेखों ने जिन महिलाओं को मिटा दिया था, कविता उन्हें वापस मुख्यधारा में ला रही है। इसके लिए वे आयरिश भाषा, लोककथाओं और विलाप (कीनिंग) जैसी पुरानी परंपराओं का सहारा लेती हैं। उनकी कविताएँ “आर्काइव 41.2” और “द होम फॉर अनमैरिड फादर्स” जैसे शीर्षकों के माध्यम से उन सरकारी भाषाओं को चुनौती देती हैं जिन्होंने महिलाओं के शरीर और उनकी चुप्पी पर शासन किया।

लुसी शैली के साथ एक साक्षात्कार में, ऐनेमैरी इस ‘बेचैनी’ के बारे में बात करती हैं। वह मानती हैं कि यह बेचैनी केवल गुस्सा या हताशा नहीं है, बल्कि बदलाव की एक प्यास है। पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के लिए स्थिर रहना हमेशा सुरक्षित नहीं रहा है, इसलिए उन्हें तेज चलना पड़ा, और यही गति उनकी कविताओं में बेचैनी के रूप में झलकती है।

शब्दों का जादुई प्रभाव

कविता को केवल इतिहास दर्ज करने का साधन मानना भूल होगी। ऐनेमैरी और लुसी शैली की बातचीत इस बात पर प्रकाश डालती है कि कविता में एक जादुई तत्व होता है। ऑद्रे लॉर्ड के विचारों का समर्थन करते हुए, ऐनेमैरी मानती हैं कि कविता रैखिक समय (लीनियर टाइम) से परे काम करती है। जब हम कविता लिखते या बोलते हैं, तो हम एक ऐसी दुनिया में कदम रखते हैं जहां अतीत को बदला जा सकता है और भविष्य को संवारा जा सकता है। यह केवल पीड़ा का दस्तावेजीकरण नहीं है, बल्कि एक ‘पोर्टल’ है—बदलाव का एक द्वार।

अतः चाहे वह मीर तक़ी मीर का यह कहना हो कि दुनिया में कुछ ऐसा करके चलो कि बहुत याद रहो, या आयरलैंड की कवयित्री का विस्मृत महिलाओं को आवाज़ देना हो—साहित्य का काम एक ही है। यह हमें यह याद दिलाता है कि भले ही आँधी हमारे बस में न हो, मगर चिराग जलाना और अपनी आवाज़ उठाना हमेशा हमारे इख्तियार में होता है।

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