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कहां बनती है वोटिंग वाली अमिट स्याही? क्या हैं उसकी हर बूंद की कीमत? जानिए इससे जुड़े कई सवालों के जवाब

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण और पंजाब में भी सभी 117 सीटों पर वोटिंग शुरू हो गई है। वोट करने के दौरान एक सवाल जो अक्सर मतदाता के मन में उठता है वह यह कि आखिर उसका वोट कितना सुरक्षित रहेगा और कोई दूसरा उसके नाम से फ़र्ज़ी वोट तो नहीं डालेगा। इसलिये वोटिंग वाली अमिट स्याही का इस्तेमाल होता है।

वोट डालने के बाद बाएं हाथ की तर्जनी उंगली पर लगी स्याही के साथ सेल्फी आपने भी जरूर ली होगी। खासतौर से युवाओं में इसे लेकर काफी क्रेज देखने को मिलता है। वोट डालने के बाद मतदाता के हाथ की अंगुली के नाखून पर स्याही से निशान लगाया जाता है ताकि पता चल सके कि इस मतदाता ने वोट डाल दिया है। इसका मुख्य उद्देश्य फर्जी मतदान रोकना है।

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दिलचस्प तथ्य है कि इस अमिट स्याही का इस्तेमाल पहली बार 1962 के तीसरे आम चुनाव में हुआ था ताकि फर्जी मतदान रोका जा सके। यह स्याही मैसूर में बनाई जाती है जो लगाने के बाद 60 सेकेंड में ही सूख जाती है।

उंगली पर अमिट स्याही लगाने का ये फैसला बेहद कारगर रहा। यही वजह है कि 2019 में भी इसी स्याही का इस्तेमाल हो रहा है। अभी तक इसके विकल्प के बारे में सोचा तक नहीं गया है। ये बताता है कि उंगली पर स्याही लगाने का विचार और फैसला किस कदर काम आया है।

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एक ही आदमी बार बार वोट करता है, ऐसी शिकायतें सामने आयी थी। फिर चुनाव आयोग ने इसके लिए नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी ऑफ इंडिया (NPL) से संपर्क किया। इसके बाद एनपीएल ने ऐसी अमिट स्याही तैयार की, जिसे ना तो पानी से और ना ही किसी केमिकल से हटाया जा सकता था। एनपीएल ने यह स्याही बनाने का ऑर्डर मैसूर पेंट एंड वार्निश कंपनी (Mysore Paints and Varnish Limited, MPVL) को दिया।

स्याही को नेशनल फिजिकल लैबोरेटरी आॅफ इंडिया के रासायनिक फाॅर्मूले का इस्तेमाल कर तैयार किया जाता है। इसका मुख्य रसायन सिल्वर नाइट्रेट है। स्याही में यह 5 से 25 फीसदी तक होता है। मुख्यत: बैंगनी रंग का यह केमिकल प्रकाश में आते ही रंग बदल लेता है और इसे किसी भी तरह से मिटाया नहीं जा सकता।

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इस्तेमाल की जाने वाली स्याही सबसे पहले मैसूर के महाराजा नालवाडी कृष्णराज वाडियार ने 1937 में स्थापित मैसूर लैक एंड पेंट्स लिमिटेड कंपनी में बनवाई थी। लेकिन निर्वाचन प्रक्रिया में पहली बार इसका इस्तेमाल 56 साल पहले 1962 के चुनाव में हुआ था।

एमपीवीएल की बनी अमिट स्याही का प्रयोग सिर्फ भारत में ही नहीं होता। दुनियाभर के कई सारे देश एमपीवीएल से यह अमिट स्याही खरीदते हैं और अपने यहां चुनावों में इसका उपयोग करते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार 28 देश एमपीवीएल से यह स्याही खरीदते हैं। इन देशों में दक्षिण अफ्रीका, कनाडा, मलेशिया, मालदीव, कंबोडिया, अफगानिस्तान, तुर्की, नाइजीरिया, नेपाल, घाना, पापुआ न्यू गिनी, बुर्कीना फासो, बुरुंडी, टोगो और सिएरा लियोन भी शामिल हैं।

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सरकार ने लोकसभा चुनाव 2019 के लिए कुल 26 लाख फाइल्स का इंतजाम किया है. हर फाइल्स यानी बोतल में 10 एमएल स्याही होती है। 26 लाख बोतल पर कुल खर्च 33 करोड़ यानी हर बोतल पर करीब 127 रुपये। इस लिहाज से 10 एमएल की कीमत 127 रुपये और 1 लीटर की कीमत करीब 12,700 रुपये होगी। वहीं एक एमएल यानी एक बूंद की बात करें तो 12.7 रुपये इसकी कीमत बैठेगी।

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